प्रबोधिनी एकादशी, जिसे दिठवन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को मनाई जाती है। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि इसी दिन भगवान श्रीविष्णु योगनिद्रा से जाग्रत होकर संसार में पुनः धर्म, पुण्य और मंगल की ऊर्जा का संचार करते हैं।
स्वामी अमित शुक्ल ने बताया कि पद्मपुराण में इस तिथि का अत्यंत महत्त्व वर्णित है। नारदजी द्वारा पूछे जाने पर ब्रह्माजी ने कहा है— प्रबोधिनी एकादशी पाप नाशिनी, पुण्य वृद्धि करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इस एकादशी का एक दिन का उपवास हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर फल देता है। यह व्रत मेरु पर्वत के समान बड़े से बड़े पापों का भी नाश करने वाला माना गया है। एकादशी के जागरण से पूर्व जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं और व्रती के पितरों को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
स्वामी जी ने कहा कि व्रत करने वाले को ऐश्वर्य, बुद्धि, राज्य, सुख तथा मनोवांछित फल सहज रूप से प्राप्त होते हैं। इस दिन भगवान श्रीविष्णु को शंख में जल और तुलसी पत्र अर्पित कर अर्घ्य देना, पञ्चामृत से अभिषेक तथा षोडशोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भगवान माधव के निमित्त किया गया स्नान, दान, जप और होम अक्षय फल प्रदान करता है।
कार्तिक मास में तुलसी का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस मास में एक तुलसी-दल अर्पित करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है। इसी दिन गन्ने का पूजन और तुलसी–शालिग्राम विवाह का विशेष महोत्सव भी श्रद्धा और उत्साह से संपन्न किया जाता है।
अंत में स्वामी अमित शुक्ल ने कहा कि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत केवल धार्मिक परंपरा भर नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सदाचार और सत्पथ पर अग्रसर होने का अवसर है। इस पावन तिथि पर किया गया छोटा सा सत्कर्म भी अनंत पुण्य का कारण बनता है। अतः प्रत्येक श्रद्धालु को चाहिए कि जागरण, सेवा और भक्ति के माध्यम से अपने जीवन में सद्भाव, शांति और दिव्यता का संचार करें।

